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HOLI 2024: आधुनिक चकाचौंध में भारतीय संस्कृति पर्व का दायरा सिकुड़ा - प्रेमनारायण गौर

लोगों ने प्रतीक के तौर पर द्वारा होलिका पूजन किया गया। प्रेमनारायण गौर ने बताया कि प्रहलाद रूपी धर्म की रक्षा के लिए होलिका पूजन करते हैं यह परंपरा आज तक चली आ रही है

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By Ankush Baraskar
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HOLI 2024/संवाददाता मदन गौर हरदा:-  कहते हैं कि होली उमंग व उल्लास का पर्व है, जो दिलों की दूरियां पाट कर मेल जोल बढ़ाता है लेकिन पाश्चात्य भागदौड़ भरी जिंदगी और आधुनिकता चकाचोंध के कारण संस्कृति के बढ़ते प्रादुर्भाव के चलते साल दर साल भारतीय संस्कृति के पर्वों का दायरा सिकुड़ता जा रहा है। इस वर्ष होली पर्व पर कहीं भी रौनक दिखायी नहीं दी। पहले के जमाने में इंसान के पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं होता था आदमी मनोरंजन के लिए त्योहारों पर ज्यादा आशिक रहता था और हर त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था आपसी भाईचारे मिलन के साथ त्योहारों की परंपरा बखूबी निभाई जाती थी. 

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लेकिन इस नए दौर के जमाने में यह परंपरा लुप्त होती जा रही है गौर समाज के जिलाध्यक्ष वरिष्ठ समाज सेवक प्रेमनारायण जी गौर ललेटिया ने बताया कि पहले के दिनों में और आज वर्तमान दिनों में जमीन आसमान का अंतर है होली पर्व पर बनने वाली परम्परागत फागुन महीना  लगते ही  होली की तैयारी में लग जाते थे  ग्राम की मंडियों द्वारा  घेरा बाजी का प्रोग्राम  हाथ के गीतों से  गुंजयमान  होता था  होली का डांडा  होली स्थान पर 4 दिन पहले ही  गड़ा दिया जाता था पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर  होली का लकड़ी द्वारा रखते थे.और पूरे ग्राम उस जगह पूजन करने के लिए  हर घर से आते हैं।

गाय के गोबर से बरेले ले जा कर होली का गीत पूजा अर्चना करते थे ग्राम के मुखिया द्वारा शुभ मुहूर्त में पंडित के सानिध्य में पूरे ग्राम के ग्रामीणों के साथ ग्राम के मुखिया होलिका की पूजन अर्चना करके विधि विधान से बाद में होलिका दहन करते थे जो दूसरे दिन तक भी उस होलिका की आग ठंडी नहीं होती थी प्रातः पूरे ग्राम के लोग होली स्थान पर जाकर जहां होली जलती है वहां रंग-गुलाल करने के बाद रंग गुलाल करने का सिलसिला चालू होता था और दिन भर रंग गुलाल मैं सरोवर हो जाते थे जहां जिस घर में किसी की मृत्यु हो जाती थी वहां सुबह रंग गुलाल करने जाते थे.

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और जिस घर में विवाह या पुत्र रत्न की प्राप्ति होती वहां खुशियाली मना कर फाग की बधाई दी जाती थी और दिन भर घेरा ढोलक मंजीरे की थाप पर फागुन के लोकगीत गाए जाते थे पुराने जमाने में ऐसे मनाई जाती थी होली पकवान गुजिया, पपडिय़ां, बर्फी गुलाब जामुन जैसे पकवानों का जायका भी महंगाई ने बिगाड़ दिया है। लोगों ने प्रतीक के तौर पर द्वारा होलिका पूजन किया गया। प्रेमनारायण गौर ने बताया कि प्रहलाद रूपी धर्म की रक्षा के लिए होलिका पूजन करते हैं यह परंपरा आज तक चली आ रही है

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