धरती पर भगवान के रूप में आया ये पौधा, शुगर बीपी की बीमारियों को चुटकियो में करता गायब जाने क्या है इसका रहस्य

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धरती पर भगवान के रूप में आया ये पौधा, शुगर बीपी की बीमारियों को चुटकियो में करता गायब जाने क्या है इसका रहस्य

लिंगुड़ा एक ऐसा पौधा है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन यह कई औषधीय गुणों से भरपूर है। हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ बायो-रिसोर्स टेक्नोलॉजी (IHBT) पालमपुर द्वारा किए गए प्रारंभिक शोध में इस पौधे के औषधीय गुणों का पता चला है। इसके बारे में संस्थान के राष्ट्रीय सेमिनार में भी चर्चा हुई थी। लिंगुड़ा विटामिन ए, बी कॉम्प्लेक्स, पोटेशियम, तांबा, लोहा, फैटी एसिड, सोडियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, कैरोटीन और खनिज पदार्थों का समृद्ध स्रोत है। इसे कुपोषण से निपटने के लिए एक अच्छा विकल्प माना जाता है।

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कैसे हो सकती है खेती

यह पौधा जून से सितंबर तक पहाड़ी क्षेत्रों में उगता है, लेकिन अब इसे टिश्यू कल्चर तकनीक से भी उगाया जा सकता है, जिससे इसे साल भर उपलब्ध कराया जा सके। IHBT के वैज्ञानिकों के शोध में पाया गया कि लिंगुड़ा त्वचा और मधुमेह जैसी बीमारियों से बचाने में मदद करता है और हृदय स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है।

लिंगुड़ा का उपयोग

लिंगुड़ा का इतिहास बहुत पुराना है और इसे एक प्राचीन पौधा माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, लुंगडू या डिप्लाजियम मैक्सिमम एक बड़ा पत्ती वाला फर्न है, जो हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके कोमल घुमावदार भाग (क्रोज़ियर) को स्थानीय बाजारों में लुंगडू के नाम से बेचा जाता है और इसे सब्जी या अचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

पाई जाती है 1200 प्रजातिया

हिमालय क्षेत्र और देश भर में लुंगडू की लगभग 1200 प्रजातियां पाई जाती हैं। प्रारंभिक शोध से पता चला है कि लिंगुड़ा में मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों को रोकने की क्षमता है। उत्तराखंड में इसे “लिंगडा” के नाम से भी जाना जाता है।

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धर्मशाला में लिंगुड़ा को बढ़ावा देने के लिए “लिंगुड़ा चौक” का उद्घाटन किया गया था, जहां पर दुनिया की सबसे ऊंची फिडलहेड (लिंगुड़ा) की मूर्ति स्थापित की गई है। इसका उद्देश्य इस पारंपरिक औषधीय पौधे के प्रति जागरूकता फैलाना है ताकि आने वाले पर्यटक इसके महत्व को समझ सकें।

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